जी हाँ ये सच है और पैदा होने वाली है लड़की, थॉमस बेट्टी की गर्भावस्था इस समय लगबग ६ महीने की हो चुकी है यानि ३ महीने और बचे हैं बच्ची के पैदा होने में, Expected Date is 3 July 2008।

“I have a very stable male identity,” he added, in an interview, broadcast on The Oprah Winfrey Show in the United States.

Mr Beatie ३४ साल के हैं और इस समय Oregon में रहते हैं, दरअसल ये कहानी थोड़ा सा घुमावदार है। Mr Beatie पैदायशी औरत थे लेकिन १० साल पहले उन्होंने आदमी बनने के लिये अपना सेक्स बदलवा लिया। शरीर के बाकी हिस्से तो उन्होंने आदमी जैसे करवा लिये लेकिन औरतरूपी शरीर के अंदरूनी हिस्से जो बच्चा पैदा करने के लिये जरूरी है उससे उन्होंने कोई छेड़छाड़ नही करने दी और अपने शरीर के अंदर रहने दिया क्योंकि एक दिन उन्हें बच्चा पैदा करना था।

“It’s not a male or female desire to have a child. It’s a human desire,” said thinly bearded Thomas Beatie, who was once a teenage beauty queen.

Mr Beatie की पत्नी नेन्सी ने स्पर्म बैंक से खरीद उनके अंदर सीरिंज की मदद से स्पर्म डाला, इन दोनों की शादी को ५ साल हो चुके हैं, नेन्सी के पहली शादी से पहले ही २ बेटियां हैं। ये

“I can’t believe it. I can’t believe she’s inside me,” said Mr Beatie.

शादी कानूनी रूप से पूरी तरह वैध है, जच्चा और बच्चा दोनों सकुशल और तंदुरस्त हैं। इससे पहले की कोशिश में Triplet थे जो कि ectopic pregnancy थी और ज्यादा दिन नही रही।
इनकी कहानी इन्हीं की जुबानी यहाँ पढ़िये

अब क्लासिकल मेडिकल मिस्ट्री
Man With Twin Living Inside Him, वो भी चार दशक तक है ना मिस्ट्री, वैसे ये बात थोड़ा पुरानी है यानि जून १९९९ की घटना है। ये कहानी है संजू भगत की जिनका पेट इतना फूल चूका था जैसे ९ महीने की गर्भावस्था। संजू भगत नागपुर में रहते हैं और इस बात का पता चला जब उन्हें इमरजेन्सी में मुम्बई के टाटा मैमोरियल हास्पिटल ले जाया गया।

One doctor recalled that day in the operating room, “He just put his hand inside and he said there are a lot of bones inside,” she said. “First, one limb came out, then another limb came out. Then some part of genitalia, then some part of hair, some limbs, jaws, limbs, hair.”

Inside Bhagat’s stomach was a strange, half-formed creature that had feet and hands that were very developed. Its fingernails were quite long.

“We were horrified. We were confused and amazed,” Mehta said.

दरअसल हुआ ये कि जब संजू भगत अपनी माँ के पेट में रहे होंगे तब उनके जुड़वाँ भाई का फेटुस उनके अंदर ही कहीं फंस गया। और ४ दशक बाद इतना बड़ा होने पर ही इसका पता चल पाया।
इस पूरी खबर को यहाँ पढ़िये: A Medical Mystery Classic - Man With Twin Living Inside Him

साथ ही पहली ह्यूमन मेल प्रिगनेन्सी - मि. ली मिंगवी का भी पता चला जिनके गर्भ के विकास को आन लाईन भी देखा जा रहा है, आप भी अगर एक नजर दौड़ाना चाहें तो यहाँ जाकर देख सकते हैं।

दरअसल The Oprah Winfrey Show में Mr Beatie की कहानी के बाद हमने सर्च मारी तो ये सब पता चला।

तारे भी तो अनगिनत हैं, कुछ अच्छे हैं तो कुछ सच्चे, कुछ प्यारे हैं तो कुछ न्यारे। लेकिन इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनके लिये कोई भी शायद नही कहना चाहे तारे जमीन पर। लेकिन चाहने से अगर कुछ होता तो हम भी बहुत कुछ चाहने लगते।

आप जरूर सोच रहे होंगे कि इतने दिन तक गायब रहने के बाद अचानक आकर मैं ये किस तरह की बातें करने लगा हूँ। क्या करूँ आना तो नही था लेकिन बोले बिना रहा भी नही गया अभी जब ईमेल चेक कर रहा था तो इस खबर के लिंक पर नजर गयी, जाकर देखा तो पता चला ८-९ साल के थर्ड ग्रेडरस अपनी टीचर का बोरिया बिस्तर समेटने की तैयारी करके आये थे। ज्यादा आप खुद जाकर पढ़ लें

अगर आप ३ साल पहले हिंदी चिट्ठाजगत से वाकिफ नही थे तो मुंगेरी को भी नही जानते होंगे। मुंगेरी जब आया था तब हिंदी चिट्ठाजगत में मुट्ठीभर लोग थे जो खुद ही चिट्ठा लिखते और खुद ही आपस में एक-दूसरे का चिट्ठा बांचते। हिंदी चिट्ठे पढ़ने वालों का भी अकाल था उन दिनों, हमने भी अपना नया नया ही हिंदी चिट्ठा शुरू किया। हिंदी भी ठीक से लिखनी नही आती थी, और हम ले आये थे मुंगेरी को हिंदी चिट्ठाजगत में जो हमारी तीसरी या चौथी पोस्ट थी। हालांकि उस समय हमारी पोस्टों को मिली सारी टिप्पणियां हम खो चुके हैं लेकिन कुछ महीनों पहले एक दिन हमारे पास आशीष की एक ईमेल आयी जिसमें पूछा था, “आगे कब लिखोगे?”

अब पहले आप लोगों को बता दूँ, मुंगेरी वास्तव में एक कहानी थी जो हमने अपने शुरू के दिनों में लिखी थी जब हम कहानियाँ पहले पेपर पर लिखते थे फिर आराम से टाईप करते थे। ३ भाग लिखने के बाद हमारे वो पेपर गुम हो गये जिसमें कहानी लिखी थी, इसलिये आगे लिखना बंद कर दिया।

आज जब अपना मेल बॉक्स साफ कर रहे थे तो वो मेल दिख गयी, हमने सोचा क्यों ना फिर से उस कहानी को खत्म करने की कोशिश की जाय। एक ऐसी कहानी जो ३ साल पहले छुट गयी थी जिसे पूरा करना है इसलिये हम मुंगेरी को वापस बुलाने की सोच रहे हैं। अगर आप लोग मुंगेरी की अब तक की कहानी जानना चाहते हैं तो ये रहे लिंक।

मुंगेरी - भाग १, भाग २, भाग ३

कहानियों पर अन्य प्रयोगः
जब हिन्दी चिट्ठाजगत का कुनबा बहुत छोटा था तब एक प्रयोगात्मक चिट्ठा शुरू किया गया था जिसका नाम था बूनो कहानी। जिसमें कहानी कोई लिखता था, उसे परवान कोई दूसरा चढ़ाता था और खत्म कोई तीसरा। इस तरह से इस प्रयोगात्मक चिट्ठे में कई कहानियां भी लिखी गयीं। इन्हीं में एक अनाम कहानी थी, जिसका दूसरा भाग हमने भी लिखना शुरू किया था लेकिन आधा लिखने के बाद पता चला कि गोविंदजी ने इसी कहानी का दूसरा भाग लिख कहानी भी समाप्त कर दी है।

और एक कहानी हमने शुरू की थी अपराध बोध, और इसको पूरा मीनाक्षीजी ने किया, यहाँ आप इस पूरी कहानी को पढ़ सकते हैं

इस बूनो कहानी में, अपने जीतू भाई द्वारा शुरू की गयी कवर स्टोरी: घासीराम की भैंस अपने पूरे होने का बाट जोह रही है। आप में से अगर कोई इच्छुक हो तो उसे पूरा कर सकता है।

बिग बी इंडिया की राजनीति में चले नही तो लगता है उनके चाहने वालों ने सोचा है उन्हें देश से बाहर कहीं और से लड़ाया जाय। अब ये कहीं और अमेरिका के सिवा कहाँ हो सकता है जहाँ आजकल चुनावी माहौल बड़ा गरम है। तो बिग बी ने अमेरिका में चुनाव लड़ने का मन बनाया, और पहुँच गये यहाँ अमेरिका के Edison में। ये मन क्यों बनाया ये जानने के लिये ये मजेदार विडियो यहाँ जाकर देखिये। इसे ईमेल के जरिये एक दोस्त ने भेजा, है बड़ा मजेदार ये बदमाश टीवी।

हमें ये बताते हुए बड़ा दुख हो रहा है कि अत्यधिक खुशी के सदमें से हमारे पहचान के एक ब्लोगर की आकस्मिक मौत हो गयी। सुबह सुबह जब भाभीजी का फोन आया और जब उन्होने ये बताया तो हमें कुछ बूझते नही बना।

हमारे डिटेल से पूछने पर इतना ही पता चल पाया कि रोज की तरह आज सुबह भी ये अपनी ब्लोगिंग की रिसर्च में कंप्यूटर में नजरे गढ़ायें अपनी आंखेङ फोड़ रहे थे कि अचानक उछल-उछल के खुशी के साथ “यूरेका यूरेका” चिल्लाने लगे (ज्ञात रहे कि किसी अन्य भाषा में यूरेका का मतलन मिल गया होता है)। जब बहुत देर तक इनका उछलना चिल्लाना बंद नही हुआ तो इनकी पत्नी ने उन्हें शांत होने को कहा और ये ऐसे शांत हुए कि अब उठ ही नही रहे, हमेशा के लिये शांत हो गये।

हम कर भी क्या सकते थे खेद प्रकट किया और फोन रख दिया लेकिन मन ही मन ये सोच रहे थे कि काश दिलकार नेगी की इस “ब्लोगिंग छोड़ो” वाली किताब का पता कुछ दिन पहले चल जाता तो एक प्रति उन्हें ही भेंट कर आते। अब आप उस ब्लोगर और उसकी रिसर्च से परिचित तो होंगे नही इसलिये हम आपको उसके बारे में बताये देते हैं।

ये साहेब अच्छे खासे हंसते खेलते इंसान थे फिर एक दिन अचानक ना जाने क्या हुआ कि ब्लोगर हो गये। हमने बहुत समझाया कि ब्लोगर मत बनो, तरह तरह से अपना दुखड़ा रोया लेकिन ये साहेब मानने को ही तैयार नही हुए।

ब्लोगर बनने के १-२ हफ्ते बाद मिले तो थोड़ा दुःखी लग रहे थे, हमने पूछा क्यों क्या हो गया ये मुँह क्यों लटका हुआ है? ये साहेब बोले, “वो अजदकिया गये हैं“।

अब हम शार्टपिच खेलने वालों को कोई बाउंसर मारे तो सिर से ही निकलेगी, हम चारों खाने चित। हमने कहा, भैया अपने भेजे में कुछ ना घुसा ये तुम किया केरिये हो। तब इन्होंने बताया कि एक दिन घूमते घूमते वो “अजदक” पहुँच गये, जब पढ़ना शुरू किया तो कुछ पल्ले ही नही पड़ के दिया क्या लिखा है। हम समझ गये बुढ़ऊ के शब्दों के जाल में चक्करघिन्नी खाकर ही ये अजदकिया गये हैं। वो फिर आगे बोले, एक तो वैसे ही कुछ पल्ले नही पड़ रहा था ऊपर से कहीं कहीं ऐसी भाषा थी कि पूछो मत, इतने सस्ते सस्ते शब्द गालियों जैसे। हमने टोका कि गालियों जैसे नही वो गालियां ही होंगी (गाली यानि श्लील का विलोम शब्द) जो गूढ़ साहित्यिक भाषा को अत्यधिक गूढ‌ता से बचाने के लिये उपयोग में लायी जाती है। तुम अजदक नही समझोगे, उसे जाने दो, यहाँ और भी बहुत ब्लोगर हैं जो अजदक नही समझते। एक तो हम ही हैं, जब टिप्पणी करने का मन नही होता है तो हम भी अजदक हो आते हैं। अब जो बात समझ ही ना आये उस पर टिप्पणी कैसे करेंगे जो टिप्पणी करने से भी बच जाते हैं और ब्लोगिंग से भी टच में रहते हैं।

ये साहेब फिर भी बोले, “हम तो अजदक समझकर ही रहेंगे, जो अजदक ना समझे वो हिंदी ब्लोगर ही नही। हमें बीच में टोकना पड़ा, अमाँ मियाँ शुभ-शुभ बोलो अगर ऐसा हो जाय तो हिंदी ब्लोग जगत का हाल भी Bear Stearns जैसा हो जायेगा जहाँ मुश्किल से ढूँढे से कोई ब्लोगर मिलेगा।

लेकिन ये महाशय थमने का नाम ही नही ले रहे थे, बोले, “क्यों नही बचेगा, जो उनके ब्लोग में टिपियाते हैं उनके तो समझ आता है वो बचेंगे”। हमने तब समझाया कि उनके साथ तो “अजदकिया करार” हुआ पड़ा है यानि कि तुम हमको गलियाओ हम तुमको गलियायेंगे टाईप करार है, इसलिये उनको देख कोई कॉम्प्लेक्स मत पालो। लेकिन ये साहेब अपनी जिद पर अड़े रहे बोले, “वहाँ हमने कुछ महिलाओं की भी टिप्पणी देखी हैं अगर शालीनता का ऐसा लोचा होता तो वो भला वहाँ क्यों टिपियाती”। हमने एक बार फिर समझाया कि भैया अभी-अभी आये हो ज्यादा उड़ो मत वो चोखरबालियाँ हैं, बालियाँ मार-मार ऐसा घायल कर देती हैं कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाये। उन्ही के टिपियाने की वजह से वो शब्द जिन्हें तुम अश्लील कह रहे हो, अश्लील होकर भी इतनी शालीनता के साथ लिखे जाते हैं।

हमने आगे कहा, अच्छा ये छोड़ो तुम कहाँ इसके चक्कर में पड‌े हो, जितना टाईम तुम अजदक की एक पोस्ट पढ़कर समझने में लगाते हो उतनी देर में कम से कम ४-५ फुरसतिया पोस्ट पढ़ लोगे, पढ़ ही नही लोगे बल्कि समझ भी लोगे। ये साहेब बोले, “हमें नही पढ़ना फुरसतिया उनकी पोस्ट पढ़कर लगता है टीवी में कोई सास-बहू सीरियल देख रहे हैं, हर पैराग्राफ के बाद यही सोचते बैठते हैं कि अब खत्म होगा तब खत्म होगा।

हमने हार मानते हुए एक ट्राई और मारा कि अच्छा फुरसतिया छोड़ो उड़नतश्तरी देख आया करो। उनकी पोस्ट तो ठीक ठाक साईज की होती है, समझ में भी आ जाती है। और तो और समीरजी अपने बगल में बैठी लड़की/महिला के बारे में भी ऐसे लिखते हैं जैसे लगेगा कि वो तुम्हारे ही बगल में बैठी है। इन्होंने ने तो जैसे हमारी बात ना मानने की कसम खायी थी बोले, “उड़नतश्तरी, वहाँ तो मैं कभी ना जाऊँ, उनकी पोस्ट पढ़ने से ज्यादा वक्त तो उस पर मिली टिप्पणियाँ पढ़ने के लिये चाहिये। उतनी देर में तो मैं कितनी ही बार अगड़म-बगड़म करता हुआ ना जाने कितने सारथियों को निपटा आफिस के लिये नौ दो ग्यारह हो जाऊँ। ऊपर से बीबी को अगर पता चल गया तो घर निकाला मिल जायेगा। बीबी ने साफ-साफ शब्दों में कहा है, कहीं भी जाओ लेकिन उड़नतश्तरी देखने मत जाना”।

हमने टोका क्यों ऐसा क्या गुनाह कर दिया समीर ठंडी हवा का झोंका ने। तब महाशय ने बताया कि कुछ दिनों पहले भाभीजी के साथ इनकी पत्नी की बातें हुई थीं, फोन पर कह रही थी कि किसी को भी शराब, जुआ, सिगरेट कैसी भी लत लग जाये लेकिन ये साधुवाद की लत ना लगे। साधुवाद की टिप्पणी करते करते इनका ये हाल हो गया है कि पूछो मत। कुछ दिन पहले डिनर पर खाना देने के बाद जब पूछा कैसा बना है तो समीर बोले, “साधुवाद, आगे भी इसी तरह का देते रहें”। परसों जब कहा कि बच्चे बड़े हो गये हैं अब जल्दी से उनके लिये लड़की ढूँढ लेते हैं तो बोले, “क्या बात कही है आनंदम, अभी प्रत्युतर में एक पोस्ट ठेलता हूँ, साधुवाद इस बात के लिये”।

वो तो भला हो कुवैत वाले जुगाड़ी भाईसाहब का जिन्होंने इसके लिये भी जुगाड़ी लिंक बता दिया, हमें लग गया जरूर भाई इन्हें भी चौधरी बना गया। हमने पूछ ही लिया क्या जुगाड़ था, तब इन्होंने बताया कि कुवैत वाले भाई साहब बोले कि सीधे-सीधे धमका दो कि ये सब बंद नही किया तो उनके सारे कंप्यूटर के सारे ब्राउजर पर अजदक का होमपेज लगा देंगी। बस इतना सुनना था कि सुना है वो उनका गुस्सा शांत करने के लिये इंडिया ले गये हैं। जहाँ उन्हें वो किसी की मानसिक हलचल दिखाने वाले हैं।

हम सुनकर जैसे ही मुस्कुराये ये साहेब बोले, इसमें मुस्कुराने जैसा क्या है? हमने तब बताया कि हमें पता है समीरजी मानसिक हलचल क्यों दिखाने वाले हैं। देख लेना कनाडा लौटते ही भाभीजी भी साधुवाद देती नजर आने लगेंगी क्योंकि समीरजी का पिलान (ज्ञानी इसे प्लान पढ़ें) मानसिक हलचल के बहाने रीता भाभी की खिचड़ी खिलाने का है। बहुत जल्द उड़नतश्तरी में भी पारिवारिक पोस्ट का बोर्ड नजर आयेगा कि आज से बृहस्पतिवार के दिन हमारी श्रीमतीजी उड़नतश्तरी में नजर आयेंगी।

बात को लंबा खिंचता देख हमने कहा अच्छा ठीक है, हरी मिर्च तो चख सकते हो, मिर्च की तारीफ ही यही होती है तीखी लगे तो बचा लो या छोड़ दो नही तो पूरी की पूरी पेट में (यहाँ दिमाग में पढ़ें)। हरी मिर्च का दूसरा फायदा ये है कि अगर गल्ती से ज्यादा तीखी खा ली तो “सी सी” करते हुए जो भी शब्द मुँह से निकले उन्हें जाकर सस्ता शेर में पेल आओ, २-३ दाद तो कहीं नही गयी और साथ में शायर भी कहलाये जाने लगोगे। वहाँ से कबाड़खाना भी ज्यादा दूर नही है वहाँ जाकर भी अपने लायक कबाड़ ढूँढ सकते हो।

शायद वो हमारी इस फालतू बकवास से उब चुके थे, उन्होंने सीधे-सीधे हमें चैलेंज कर दिया कि वो अजदक समझ कर ही रहेंगे। आज से एक ही ब्लोग पड़ेंगे अजदक, ब्लोग में उपयोग में लायी जाने वाली गालियों का अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और जो-जो शास्त्र संभव है वो शास्त्र समझकर ही रहेंगे। आज से ही हमारी ये रिसर्च तब तक चालू रहेगी जब तक हम इसका तोड़ नही ढूँढ लेंगे। ये कह वो दनदनाते हुए चले गये।

उस दिन के बाद उनके हमेशा के लिये शांत होने की खबर इस फोन से ही पता चली जो सुबह-सुबह आया था। उनके यूरेका कहने से हमने अनुमान लगा लिया कि उन्होंने जरूर अजदक समझ लिया होगा और वो ये खुशी शायद संभाल नही पाये।

पुन्श्चः जब हम उन्हें फूल चढ़ाने गये तो उनके चेहरे पर अजदक समझने की संतुष्टता से एक अजब सी शांति व्याप्त थी। हम सोच रहे थे कि काश इससे अच्छा तो वो मोहल्ला समझने की कोशिश करते, ज्यादा से ज्यादा शब्दरूपी पत्थरों की मार से थोड़े घायल ही होते लेकिन ये हश्र तो ना होता।

उन सभी से क्षमा याचना सहित जिनका इस पोस्ट में जिक्र हुआ है। बुरा ना मानो होली है, निठल्ला चिंतन पढ़ने वाले सभी लोगों को होली की बहुत बहुत बधाई।

अब होली के अवसर पर ये एक प्यारी सी क्लिप, इसे होली का बोनस ही समझ लीजिये।




डिस्क्लेमरः ये पोस्ट पूरी तरह काल्पनिक है जो होली की पार्टी में बगैर भांग की ठंडाई पीने के तीन दिन बाद लिखी गयी है। आशा है होली के दिन आप लोग भी एक दिन के लिये ब्लोगिंग छोड अपने परिवार के साथ इस रंगों के त्यौहार का खूब आनंद उठायेंगे।

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